पिछले कुछ सालों में आपने महसूस किया होगा कि कभी बारिश बहुत कम होती है तो कभी भीषण गर्मी पड़ती है। इसके पीछे सबसे बड़ा हाथ ‘अल-नीनो’ का होता है।
समुद्र के तापमान में होने वाला एक छोटा सा बदलाव भारत के करोड़ों किसानों की किस्मत तय कर सकता है। इसे ही वैज्ञानिक ‘अल-नीनो’ कहते हैं।
आपको बता दें, जब प्रशांत महासागर के पानी में हलचल होती है, तो उसका असर भारत के दूरदराज के खेतों और रसोई के बजट पर पड़ता है। वैज्ञानिकों के लिए यह ‘अल-नीनो’ है, लेकिन आम आदमी के लिए यह सूखे और भीषण गर्मी का संकेत हो सकता है।
आइए जानते हैं कि समुद्र की लहरों में पैदा होने वाली यह गर्मी कैसे सात समंदर पार भारत के मानसून को नियंत्रित करती है।
अल-नीनो क्या है?
‘अल-नीनो’ एक स्पेनिश शब्द है जिसका अर्थ है ‘छोटा बच्चा’ (The Little Boy)। यह प्रशांत महासागर के भूमध्यरेखीय क्षेत्र (Equatorial Pacific Ocean) में समुद्र की सतह के असामान्य रूप से गर्म होने की घटना है।
- सामान्य स्थिति: आमतौर पर प्रशांत महासागर में व्यापारिक हवाएं (Trade Winds) पश्चिम की ओर बहती हैं, जो गर्म पानी को एशिया और ऑस्ट्रेलिया की तरफ धकेलती हैं।
- अल-नीनो के दौरान: ये हवाएं कमजोर पड़ जाती हैं। नतीजा यह होता है कि गर्म पानी वापस दक्षिण अमेरिका (पेरू के तट) की ओर जाने लगता है। समुद्र का यह बदला हुआ मिजाज पूरी दुनिया के वायुमंडल को प्रभावित करता है।
यह भारतीय मानसून को कैसे प्रभावित करता है?
भारतीय मानसून का सीधा संबंध ‘हिंद महासागरीय द्विध्रुव’ (IOD) और ‘प्रशांत महासागर की हवाओं’ से है। अल-नीनो भारत के लिए बुरा क्यों माना जाता है, इसके तीन मुख्य कारण हैं:
- नमी का कम होना: अल-नीनो के कारण मानसून वाली हवाएं कमजोर पड़ जाती हैं। प्रशांत महासागर की गर्मी भारत की ओर आने वाली नमी युक्त हवाओं को अपनी ओर खींच लेती है।
- कम बारिश: ऐतिहासिक डेटा बताता है कि पिछले 100 सालों में जब-जब अल-नीनो का प्रभाव रहा है, भारत में लगभग 60% बार औसत से कम बारिश या सूखा दर्ज किया गया है।
- भीषण गर्मी: अल-नीनो केवल बारिश ही नहीं रोकता, बल्कि यह भारत में ‘हीटवेव’ (Heatwave) की अवधि और तीव्रता को भी बढ़ा देता है।
इस साल मानसून पर इसका क्या असर होगा?
इस साल के पूर्वानुमानों के लिए मौसम विज्ञानी दो महत्वपूर्ण स्थितियों पर नजर रख रहे हैं:
अल-नीनो से ला-नीना की ओर बदलाव
2026 की शुरुआत में चर्चा यह है कि क्या अल-नीनो का प्रभाव कम हो रहा है?
- संकेत: यदि अल-नीनो खत्म होकर ‘न्यूट्रल’ स्थिति या ला-नीना (La-Nina) में बदलता है, तो भारत के लिए यह खुशखबरी होगी। ला-नीना में भारत में सामान्य से अधिक बारिश होती है।
- आईएमडी का रुख: भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के अनुसार, मानसून के दूसरे छमाही (अगस्त-सितंबर) में ला-नीना के सक्रिय होने की संभावना है, जो फसलों के लिए संजीवनी साबित हो सकती है।
विशेषज्ञ की राय: “अल-नीनो का मतलब हमेशा सूखा नहीं होता, लेकिन यह जोखिम जरूर बढ़ाता है। इस साल हमें ‘पॉजिटिव IOD’ की भी उम्मीद है, जो अल-नीनो के बुरे असर को कम करने में मदद कर सकता है।”
अल-नीनो और ला-नीना (La Nina) में क्या अंतर है?
| विशेषता | अल-नीनो (El Nino) | ला-नीना (La Nina) |
| समुद्र का तापमान | सामान्य से अधिक गर्म | सामान्य से अधिक ठंडा |
| भारत पर असर | सूखा और कम बारिश | भारी और अच्छी बारिश |
| खेती के लिए | नुकसानदायक | बहुत फायदेमंद |
क्या ‘बारिश की 80% संभावना’ अल-नीनो से जुड़ी है?
अक्सर पाठक पूछते हैं कि अल-नीनो के दौरान भी मौसम ऐप 80% बारिश क्यों दिखाते हैं? जैसा कि हमने पिछले लेख में समझा था, 80% संभावना एक स्थानीय घटना है।
अल-नीनो पूरे देश के लिए ‘लॉन्ग रेंज’ पूर्वानुमान को प्रभावित करता है, जबकि स्थानीय बारिश छोटे-छोटे मौसमी सिस्टम (जैसे कम दबाव का क्षेत्र) पर निर्भर करती है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
नहीं, अल-नीनो एक अनियमित चक्र है जो आमतौर पर हर 2 से 7 साल में एक बार आता है। इसकी अवधि 9 से 12 महीने तक हो सकती है।
अल-नीनो समुद्र के गर्म होने की प्रक्रिया है (जो बारिश घटाती है), जबकि ला-नीना समुद्र के ठंडा होने की प्रक्रिया है (जो भारत में बारिश बढ़ाती है)।
हाँ, कम बारिश के कारण धान, मक्का और गन्ने जैसी फसलों की पैदावार घट सकती है, जिससे खाने-पीने की चीजों के दाम बढ़ सकते हैं।
नहीं। यह बारिश कम जरूर करता है, लेकिन अगर ‘हिंद महासागरीय द्विध्रुव’ (Indian Ocean Dipole) सकारात्मक हो, तो अल-नीनो के बावजूद अच्छी बारिश हो सकती है।
रिपोर्ट्स के मुताबिक, मौजूदा अल-नीनो मई 2026 तक पूरी तरह खत्म हो जाएगा।
2026 में इसके आसार कम हैं। अधिकांश मॉडल्स दिखा रहे हैं कि मानसून के दौरान स्थिति ‘न्यूट्रल’ या ‘ला-नीना’ की तरफ रहेगी।